SC on Paid Period Leave: भारत में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए ‘पीरियड लीव’ (मासिक धर्म अवकाश) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर एक याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है।
कोर्ट का तर्क है कि इस तरह के कानून को अनिवार्य बनाने से महिलाओं को सशक्त बनाने के बजाय, उनके लिए रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।
पेड पीरियड लीव पर याचिका सुनने से SC का इनकार, CJI बोले- ‘उनका करियर खत्म हो सकता है…’ #SupremeCourt #PeriodLeave #MenstrualLeave #WomensRights #CJISuryakant #WorkingWomen #Law #StateMirrorHindi pic.twitter.com/eok7N6L7l5
— State Mirror Hindi (@statemirrornewz) March 13, 2026
कोर्ट ने क्यों किया इनकार?
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार पीरियड्स के दौरान ‘पेड लीव’ (सवैतनिक अवकाश) को कानूनी रूप से अनिवार्य कर देती है, तो इसका सबसे बुरा असर निजी क्षेत्र (Private Sector) में महिलाओं की नियुक्तियों पर पड़ेगा।
STORY | SC refuses to entertain PIL seeking menstrual leave policy across country
The Supreme Court on Friday refused to entertain a PIL seeking a nationwide policy providing menstrual leave for women students and workers, observing no one would give them jobs in such a scenario… pic.twitter.com/p4W2tFQhD6
— Press Trust of India (@PTI_News) March 13, 2026
CJI ने कहा, ये याचिकाएं सोची-समझी साजिश के तहत दायर की गई हैं।
इनका मकसद महिलाओं के मन में यह धारणा बनाना है कि आपमें अभी भी कुछ प्राकृतिक समस्याएं हैं। आप पुरुषों के बराबर नहीं हैं। आप एक निश्चित समय में उनकी तरह काम नहीं कर सकतीं।
CJI ने आगे कहा “अगर नियोक्ता (Employer) को पता चलेगा कि उसे हर महीने अनिवार्य रूप से छुट्टी देनी होगी, तो वह महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लगेगा। इससे महिलाओं की प्रगति रुकेगी और वर्कप्लेस पर उनके प्रति एक नकारात्मक मानसिकता विकसित हो सकती है।”

“महिलाओं को कमजोर मत समझिए”
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बहुत ही मार्मिक और तार्किक बात कही।
बेंच ने कहा कि पीरियड्स एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसे किसी ‘बुरी घटना’ या ‘कमजोरी’ के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
याचिकाएं जो महिलाओं को इस आधार पर छुट्टी दिलाने की मांग करती हैं, वे अनजाने में समाज में मौजूद रूढ़ियों (Stereotypes) को और मजबूत कर सकती हैं।
कोर्ट का मानना है कि महिलाओं को ‘बेचारे’ या ‘कमजोर’ के रूप में देखने की प्रवृत्ति उनके करियर के विकास में बाधा डालती है।
Delhi: Petitioner, Advocate Shailendra Mani Tripathi says, “My prayer was that working employees should get 2-3 days’ leave per month considering menstrual issues, but the court’s observation was that it would create fear, hamper women’s employment, and make employers hesitant to… pic.twitter.com/PMGPpKwfjZ
— IANS (@ians_india) March 13, 2026
नियोक्ता की मानसिकता और करियर का डर
अदालत ने कहा कि हमें उस नियोक्ता के नजरिए से भी सोचना होगा जिसे काम का आउटपुट चाहिए।
अगर कानून का डंडा चलाकर छुट्टियां अनिवार्य की गईं, तो कंपनियां महिलाओं को बड़ी जिम्मेदारियां देने से बचेंगी।
यहां तक कि न्यायपालिका और सरकारी सेवाओं में भी उन्हें ‘कम महत्वपूर्ण’ समझा जा सकता है।
सीजेआई ने चेतावनी दी कि इससे महिलाओं की मैच्युरिटी और उनकी कार्यक्षमता पर सवाल उठाए जाने लगेंगे, जो उनके लंबे करियर के लिए घातक होगा।
Menstrual Leave: The Supreme Court on Friday rejected a PIL seeking a nationwide policy to provide mandatory menstrual leaves to women students and employees. The top court said that such a law would reinforce gender stereotypes unintentionally. The bench headed by Chief Justice… pic.twitter.com/Bo9yl3Fln1
— The Daily Jagran (@TheDailyJagran) March 13, 2026
सरकार के पाले में गेंद
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा अदालत के अधिकार क्षेत्र से ज्यादा नीति-निर्धारण (Policy Making) का है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों के पास जाएं।
कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी पक्षों (कंपनियों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और महिलाओं) से चर्चा कर एक ऐसी नीति तैयार करे जो व्यावहारिक हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई कंपनी स्वेच्छा (Voluntarily) से छुट्टी दे रही है, तो वह सराहनीय है, लेकिन इसे ‘जबरन कानून’ नहीं बनाना चाहिए।
‘Women not inferior’ SC Rejects Period Leave#periodleave #supremecourt #genderdebate #womenempowerment #legalnews pic.twitter.com/eSjx5DJvlU
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भारत में वर्तमान स्थिति: कहां मिलती है छुट्टी?
भले ही पूरे देश के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं है, लेकिन भारत के कुछ राज्यों ने इस दिशा में मिसाल पेश की है:
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बिहार: 1992 से ही यहां महिला कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन की विशेष आकस्मिक छुट्टी मिलती है।
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केरल: 2023 में छात्राओं के लिए मेंस्ट्रुअल लीव को मंजूरी दी गई।
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ओडिशा: 2024 में सरकार ने सरकारी और निजी क्षेत्र में 1 दिन की वैकल्पिक छुट्टी का प्रावधान किया।
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कर्नाटक: 2025 में यहां भी साल में 12 दिन की पेड लीव का नियम लागू किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बड़े संतुलन की मांग करता है।
एक तरफ महिलाओं का स्वास्थ्य और जरूरतें हैं, तो दूसरी तरफ आर्थिक जगत में उनकी समान भागीदारी और प्रतिस्पर्धा।
कोर्ट का संदेश साफ है—समानता का अधिकार तभी फलीभूत होगा जब सुरक्षा के नाम पर महिलाओं के लिए अवसरों के दरवाजे बंद न हों।
अब पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वह एक ऐसी ‘बैलेंस्ड पॉलिसी’ लेकर आए जिसमें सेहत भी सुरक्षित रहे और करियर भी।
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