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जंतर-मंतर प्रदर्शन मामला: आशुतोष रांका और सौरभ दास ने हाईकोर्ट से याचिका वापस ली, कोर्ट ने उठाए थे गंभीर सवाल

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Delhi High Court on CJP leaders: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका को वापस ले लिया है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों नेताओं के आचरण और उनके संगठन की कार्यशैली पर कड़े सवाल खड़े किए।

हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की पाबंदी थी, तो वे वहां गए ही क्यों?

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या वे कोई ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी के युवा हैं, जिनकी उम्र कम हो? कोर्ट ने दोनों की उम्र 27 और 31 साल बताई और उनके संगठन के उद्देश्यों पर भी स्पष्टीकरण मांगा।

क्या है पूरा मामला और गिरफ्तारी की वजह?

दिल्ली सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है।

इसके बावजूद, CJP के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका 13 अक्टूबर को तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंच गए थे।

पुलिस ने नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया।

इसके अगले दिन, यानी 14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दोनों को 5 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

जब 19 अक्टूबर को उनकी यह हिरासत खत्म हुई, तो स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने उनकी कस्टडी दो दिन और बढ़ा दी।

इसी दो दिन की हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को दोनों नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और सवाल

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने कई अहम और कड़े सवाल उठाए:

* बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन: कोर्ट ने पूछा कि जब इन नेताओं ने पहले ही शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरा था, तो ऐसी घटना दोबारा क्यों हुई? यदि प्रशासन को बॉन्ड टूटने की आशंका थी और वह सच साबित हुई, तो अधिकारियों की कार्रवाई को गलत कैसे ठहराया जा सकता है?

* बैरिकेड तोड़ने पर आपत्ति: कोर्ट ने कहा कि जब प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार करते हैं, तो उनके साथ भीड़ में कई अन्य लोग भी शामिल हो जाते हैं, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है और शांति भंग होने का खतरा पैदा हो जाता है।

* शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए अनुमति: यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से करना ही था, तो पुलिस से विधिवत अनुमति ली जानी चाहिए थी। इससे असामाजिक तत्वों को समूह में घुसने से रोका जा सकता था।

* ‘ये जेन-जी नहीं हैं‘: जब वकीलों ने उनकी उम्र 27 और 31 साल बताई, तो अदालत ने टिप्पणी की कि वे किशोर या आधुनिक जेन-जी युवा नहीं हैं, जिन्हें नियमों की जानकारी न हो। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि उनका संगठन क्या काम करता है और उनका उससे क्या संबंध है।

* गलत फोरम में याचिका: हाईकोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने के लिए ‘रिवीजन याचिका’ (Revision Petition) का कानूनी विकल्प मौजूद था, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया गया।

इसके बाद अदालत ने उन्हें अपनी याचिका वापस लेकर सही कानूनी प्रक्रिया अपनाने को कहा।

सौरव और आशुतोष की याचिका में थीं ये 4 मुख्य मांगें

हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका में दोनों नेताओं ने निम्नलिखित राहत की मांग की थी:

* हिरासत का आदेश रद्द हो: स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के उस आदेश को खारिज किया जाए जिसमें कस्टडी दो दिन बढ़ाई गई थी।

* जमानतदारों को स्वीकार किया जाए: उनका आरोप था कि उनके द्वारा पेश किए गए जमानतदारों को बिना उचित कारण खारिज कर दिया गया और अन्य जमानतदारों को मौका नहीं दिया गया।

* तत्काल रिहाई की मांग: निजी मुचलके पर रिहाई की मांग करते हुए कहा गया कि हिरासत जारी रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है।

* हिरासत के आधार पर सवाल: उनका तर्क था कि प्रतिबंधित स्थल पर जाने की कोशिश करना मात्र से सार्वजनिक शांति खतरे में नहीं पड़ जाती।

अब क्राइम ब्रांच करेगी दोनों मामलों की जांच

दिल्ली पुलिस ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े जंतर-मंतर केस को भी ‘क्राइम ब्रांच’ को ट्रांसफर कर दिया है।

इससे पहले कनॉट पार्क में दर्ज मामला भी क्राइम ब्रांच को सौंपा गया था। अब दोनों मामलों की जांच एक ही एजेंसी करेगी।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, 13 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और CJP के 11 अन्य सदस्य जंतर-मंतर पहुंचे थे।

रोक के बावजूद वहां पहुंचने पर पुलिस ने कुल 14 लोगों को हिरासत में लिया था और दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की थीं।

CJP नेताओं की गिरफ्तारी का पूरा घटनाक्रम (Timeline)

* 10 अक्टूबर: कॉकरोच जनता पार्टी ‘SIR’ के विरोध और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही थी।

उसी दिन सुबह CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली एयरपोर्ट पर ही पुलिस ने हिरासत में लिया था।

 * 11 अक्टूबर: तीनों को दिल्ली कैंट की विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 50-50 हजार रुपये के मुचलके पर रिहा कर दिया गया था।

छूटने के बाद नेताओं ने उत्साह में ‘थंब्स अप’ का इशारा किया था।

 * 13 अक्टूबर: रिहाई के तुरंत बाद सौरव और आशुतोष तिरंगा लेकर दोबारा जंतर-मंतर पहुंच गए, जहां पुलिस ने उन्हें फिर से हिरासत में ले लिया।

 * 16-17 अक्टूबर: साथियों की गिरफ्तारी के विरोध में CJP ने कनॉट प्लेस में ‘लहरा दो तिरंगा’ रैली बुलाई।

रैली से ठीक पहले अभिजीत दीपके को भी हिरासत में ले लिया गया, जिन्हें बाद में 17 अक्टूबर को 50 हजार के बेल बॉन्ड पर जमानत मिल गई।

अभिजीत दीपके के बयान और उस पर सफाई

CJP के प्रमुख अभिजीत दीपके ने पहले एक वीडियो जारी कर यह दावा किया था कि इस आंदोलन का असली नेतृत्व सौरव दास और आशुतोष रांका कर रहे हैं और वे खुद केवल उनके आदेशों का पालन करते थे।

इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने दीपके की आलोचना की और आरोप लगाया कि वे अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डाल रहे हैं।

वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

बाद में अपनी सफाई देते हुए अभिजीत दीपके ने एक अन्य वीडियो जारी किया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सौरव और आशुतोष उनसे अधिक प्रतिभाशाली और तेज हैं।

उन्होंने कहा कि उनके संगठन में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है और अपने से बेहतर साथियों को स्वीकार करने में उन्हें कोई संकोच या असुरक्षा की भावना नहीं है।

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कॉकरोच पार्टी का पुराना प्रदर्शन इतिहास

आपको बता दें कि कॉकरोच जनता पार्टी पहले भी बड़े आंदोलनों में चर्चा में रही है।

पार्टी ने NEET पेपर लीक मामले में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 जून से 25 जुलाई के बीच लगातार 36 दिनों तक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था।

इस 36 दिन के लंबे आंदोलन के दौरान प्रसिद्ध एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे।

20 जुलाई को CJP ने संसद तक मार्च भी निकाला था, और आखिरकार 25 जुलाई को प्रधान के इस्तीफे के बाद वह प्रदर्शन समाप्त हुआ था।

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