Delhi Race Course Masjid Case: दिल्ली के पॉश इलाके में स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद (जयपुर पोलो ग्राउंड परिसर) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका दिया है।
अदालत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए फिलहाल इस मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए जाने की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया है।
हालांकि, कोर्ट की इस सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से एक राहत भरा आश्वासन भी सामने आया है, जिससे मस्जिद को तत्काल तोड़े जाने की आशंका टल गई है।

क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद दिल्ली के रेस कोर्स क्लब के अंदर, 7 लोक कल्याण मार्ग यानी प्रधानमंत्री आवास के पास करीब 53 एकड़ में फैली जमीन पर मौजूद लगभग 150 साल पुरानी मस्जिद से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता सैयद अहमद सऊद ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उनकी ओर से वरिष्ठ वकील एम. सुफियान सिद्दीकी ने कोर्ट में पक्ष रखा।
याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि आसपास के इलाके में अतिक्रमण हटाने और तोड़फोड़ की कार्रवाई के दौरान नमाजियों को मस्जिद के अंदर जाने से रोका जा रहा है।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि 7 अक्टूबर को जब आसपास की झुग्गियों को हटाया जा रहा था, तब इस मस्जिद की बिजली और पानी की सप्लाई भी काट दी गई थी।

उनका दावा था कि यह मस्जिद दिल्ली सरकार की 2009 की अधिसूचना के तहत ‘ग्रेड-2 विरासत स्थल’ (Grade-2 Heritage Site) का दर्जा प्राप्त है और इसे 1977 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।
याचिका में मांग की गई थी कि मस्जिद के रास्तों को खोला जाए और वहां सुरक्षा मुहैया कराई जाए ताकि लोग बिना किसी बाधा के अपनी इबादत कर सकें।
कोर्ट ने नमाज की इजाजत क्यों नहीं दी?
मामले की सुनवाई जस्टिस अनीश दयाल की बेंच कर रही है।
अदालत ने सुरक्षा और जनहित को सर्वोपरि मानते हुए नमाज के लिए लोगों को वहां जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि आसपास के इलाके में भारी तोड़फोड़ और डिमोलिशन का काम चल रहा है, ऐसे में लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर इस तोड़फोड़ के दौरान किसी आम नागरिक या नमाजी को चोट लग जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?”
कोर्ट ने माना कि इस मामले में केंद्र सरकार की यह दलील बिल्कुल सही है कि सुरक्षा इंतजामों को ताक पर रखकर लोगों को अंदर जाने की छूट नहीं दी जा सकती।
सरकार की तरफ से यह भी बताया गया कि उस इलाके में मौजूद एक मंदिर में भी फिलहाल लोगों के जाने पर रोक लगाई गई है।

केंद्र सरकार का आश्वासन: अभी नहीं टूटेगी मस्जिद
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील आशीष दीक्षित ने अदालत को आश्वस्त किया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड की तरफ से जो आवेदन या प्रतिवेदन (Representation) दिया गया है, उस पर अगले चार हफ्तों के भीतर नियमानुसार उचित फैसला लिया जाएगा।
सरकार ने स्पष्ट किया कि जब तक वक्फ बोर्ड के इस आवेदन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक मस्जिद परिसर को गिराने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
केंद्र के इस बयान को दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया है।
कोर्ट के इस रुख से फिलहाल मस्जिद के अस्तित्व पर मंडरा रहा फौरी खतरा टल गया है और मुस्लिम पक्ष को बड़ी राहत मिली है।

अगली सुनवाई 16 दिसंबर को
याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया था कि वक्फ बोर्ड ने इस मामले में उचित कदम नहीं उठाए हैं और लोगों को उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
वहीं, केंद्र सरकार के वकील ने दलील दी कि एक व्यक्ति के कहने पर इस तरह की अनुमति देना और अनगिनत लोगों को निर्माण क्षेत्र में भेजना नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की है।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड के आवेदन पर क्या फैसला लेती है।
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