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भोजशाला में अब नियमित पूजा: अयोध्या मॉडल पर होगा विकास, CM बोले- माहौल बिगाड़ा तो खैर नहीं

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Dhar Bhojshala: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने 15 मई को एक बड़ा फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने साफ तौर पर माना है कि यह परिसर राजा भोज के समय का मां वाग्देवी (सरस्वती जी) का मंदिर ही है।

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद शनिवार की सुबह भोजशाला का नजारा पूरी तरह बदला हुआ था।

सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु और हिंदू संगठनों के पदाधिकारी वहां पहुंचे।

सालों बाद बिना किसी पाबंदी और रोक-टोक के लोगों ने मां वाग्देवी के स्थान और यज्ञ कुंड के सामने शीश नवाया।

परिसर के भीतर हनुमान चालीसा का पाठ भी किया गया।

दर्शन करके बाहर आए लोगों की आंखों में खुशी थी और उन्होंने कहा कि भोजशाला हमेशा से मंदिर थी, है और हमेशा रहेगी।

CM मोहन यादव का बड़ा एलान: अयोध्या की तर्ज पर होगा विकास

इस बड़े फैसले के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य सरकार का रुख साफ कर दिया है।

मुख्यमंत्री ने एलान किया कि धार के इस पूरे क्षेत्र को अब अयोध्या के राम मंदिर मॉडल की तर्ज पर भव्य रूप से विकसित किया जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि चूंकि यह एक एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित स्मारक है, लेकिन फिर भी कोर्ट के आदेश के मुताबिक यहां जनसुविधाओं और पर्यटन को बढ़ावा देने वाले विकास कार्यों पर कोई रोक नहीं है।

सीएम बोले- माहौल बिगाड़ा तो खैर नहीं!

मुख्यमंत्री ने कानून-व्यवस्था को लेकर भी बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि कुछ लोग धर्म की आड़ में इलाके की शांति भंग करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन ऐसे उपद्रवियों को पहले ही चिह्नित (आइडेंटिफाई) कर लिया गया है।

अगर किसी ने भी माहौल बिगाड़ने की जुर्रत की, तो प्रशासन उससे पूरी सख्ती से निपटेगा।

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हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार हाई कोर्ट के हर निर्देश का अक्षरशः पालन करेगी और दोनों पक्षों से बातचीत कर शांतिपूर्ण रास्ता निकाला जाएगा।

लंदन से आएगी मां वाग्देवी की मूल मूर्ति, मस्जिद के लिए जमीन पर विचार संभव

भोजशाला की मूल वाग्देवी (सरस्वती) प्रतिमा इस समय लंदन के एक म्यूजियम में रखी हुई है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि इस प्राचीन और पवित्र प्रतिमा को वापस भारत लाने के लिए राज्य सरकार, केंद्र सरकार से विशेष आग्रह करेगी और इसके लिए हर संभव कूटनीतिक प्रयास किए जाएंगे।

वहीं, दूसरी तरफ एक बड़ा दिल दिखाते हुए मुख्यमंत्री ने यह भी साफ किया कि यदि मुस्लिम पक्ष नमाज या मस्जिद के लिए अलग से जमीन की मांग करता है, तो सरकार उस पर पूरी गंभीरता से विचार करेगी।

हाई कोर्ट के आदेश में भी यह व्यवस्था दी गई है कि इसके लिए मुस्लिम पक्ष को आवेदन करना होगा, जिस पर राज्य सरकार नीतिगत फैसला ले सकती है।

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मुस्लिम पक्ष जाएगा सुप्रीम कोर्ट, हिंदू पक्ष ने पहले ही घेरी ‘किलेबंदी

हाई कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहा है।

लेकिन हिंदू पक्ष भी इस बार पूरी तैयारी में है।

हिंदू पक्ष के मुख्य वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि मुस्लिम पक्ष की संभावित अपील को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में पहले ही दो ‘कैविएट’ (Caveat) याचिकाएं दाखिल कर दी गई हैं।

इसका मतलब यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट हिंदू पक्ष की दलीलें सुने बिना इस मामले में एकतरफा कोई स्टे या आदेश जारी नहीं करेगा।

इस फैसले में हाई कोर्ट ने 7 अप्रैल 2003 के उस पुराने एएसआई (ASI) आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार को एक निश्चित समय के लिए परिसर के अंदर नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी।

अब इस स्थल की पूरी देखरेख, नियमन और प्रशासनिक व्यवस्था केवल और केवल एएसआई के हाथों में ही रहेगी।

5 बिंदुओं में समझिए: अयोध्या और भोजशाला के फैसले में क्या है समानताएं?

हाई कोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘अयोध्या जजमेंट’ का बार-बार हवाला दिया है।

दोनों फैसलों में अद्भुत समानताएं हैं, जिन्हें नीचे दिए गए बिंदुओं से आसानी से समझा जा सकता है:

ASI की वैज्ञानिक रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई की खुदाई और सर्वे रिपोर्ट को सबसे बड़ा और वैज्ञानिक आधार माना था।

हाई कोर्ट ने धार मामले में भी एएसआई द्वारा हाल ही में सौंपी गई वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट को ही मुख्य आधार बनाया है।

गैर-इस्लामिक ढांचा: विवादित ढांचे के नीचे एक प्राचीन भव्य हिंदू मंदिर होने के प्रमाण मिले थे।

सर्वे में साफ हुआ कि राजा भोज के काल की प्राचीन हिंदू संरचना (मंदिर) के ऊपर ही नया निर्माण किया गया था।

आस्था और लगातार पूजा: हिंदू पक्ष वहां सदियों से लगातार पूजा और परिक्रमा करता आ रहा था, जिसके सबूत मिले।

यहाँ भी बिना किसी रुकावट के मां सरस्वती की पूजा और बसंत पंचमी पर बड़े आयोजनों का इतिहास रहा है।

मूर्ति न होने से महत्व कम नहीं: कोर्ट ने माना था कि यदि किसी कारण से गर्भगृह में मूर्ति मौजूद नहीं है, तो भी उस स्थान का धार्मिक चरित्र खत्म नहीं होता।

यहाँ भी भले ही मूल मूर्ति लंदन में है, लेकिन पत्थरों और शिलालेखों पर उकेरे गए श्लोक और चिह्न चीख-चीखकर इसके मंदिर होने की गवाही दे रहे हैं। |

लंबे उपयोग से मालिकाना हक नहीं: केवल लंबे समय तक नमाज पढ़ने या कब्जा रखने से मुस्लिम पक्ष का जमीन पर कानूनी अधिकार सिद्ध नहीं होता। |

कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति मिल जाने से दूसरे (हिंदू) पक्ष के मौलिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते। |

धार की भोजशाला का यह फैसला कानूनी और सामाजिक दोनों ही मोर्चों पर बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।

सरकार जहां इसे एक बड़े सांस्कृतिक केंद्र और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का खाका खींच चुकी है, वहीं प्रशासन की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्षेत्र में अमन-चैन हर हाल में कायम रहे।

दोनों पक्षों के पास अब कानूनी रास्ते खुले हैं, लेकिन फिलहाल धार की जनता और श्रद्धालुओं के लिए यह फैसला किसी बड़े उत्सव से कम नहीं है।

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