UPI MDR charge survey: भारत में रोजाना चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक UPI से पेमेंट करना आम बात हो चुकी है।
लेकिन आने वाले दिनों में देश के इस सबसे लोकप्रिय डिजिटल पेमेंट सिस्टम को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
हाल ही में हुए ‘लोकलसर्कल्स’ के एक सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जो बताते हैं कि UPI पेमेंट पर लगने वाला नया चार्ज देश में डिजिटल लेनदेन की रफ्तार धीमी कर सकता है।
क्या है नया नियम और कितना लगेगा चार्ज?
नए नियमों के अनुसार, ₹2,000 से अधिक के UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) यानी सर्विस चार्ज लगाने का प्रस्ताव है।

सीधे शब्दों में कहें तो अगर कोई ग्राहक किसी दुकान से ₹2,000 से ज्यादा की खरीदारी करता है और UPI से पेमेंट करता है, तो उस ट्रांजैक्शन पर 0.4% फीस लगेगी।
दुकानदार चार्ज देने को तैयार नहीं
लोकलसर्कल्स ने देश के 242 जिलों में 32,000 से अधिक व्यापारियों और कारोबारियों के बीच यह सर्वे किया।
सर्वे के नतीजों से साफ है कि 83% दुकानदार इस अतिरिक्त खर्च या फीस को अपनी जेब से भरने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
केवल 17% मर्चेंट्स ने ही माना कि वे इस 0.4% फीस का बोझ खुद उठा सकते हैं।
ग्राहकों पर पड़ा बोझ, तो ठप हो सकता है UPI
जब यही सवाल देश के 291 जिलों में रहने वाले 67,000 से अधिक UPI यूजर्स से पूछा गया, तो बड़ा खुलासा हुआ।
86% ग्राहकों ने साफ कहा कि अगर दुकानदार उनसे ₹2,000 से ऊपर के पेमेंट पर एक्स्ट्रा चार्ज मांगेंगे, तो वे UPI से पेमेंट करना पूरी तरह बंद कर देंगे।
ऐसे में लोग कैश (नकद) या डेबिट-क्रेडिट कार्ड जैसे पुराने तरीकों पर वापस लौट सकते हैं।
बड़े लेन-देन का गणित: संख्या कम, लेकिन रकम बड़ी
आंकड़ों के नजरिए से देखें तो दुकानदारों को मिलने वाले कुल UPI पेमेंट्स में ₹2,000 से बड़े ट्रांजैक्शंस की संख्या महज 5% से भी कम है।
लेकिन जब बात पैसों के मूल्य (वैल्यू) की आती है, तो यह आंकड़ा बहुत बड़ा हो जाता है।
दुकानदारों के पास आने वाले कुल पैसों का लगभग 67% हिस्सा इन्हीं बड़े पेमेंट्स से आता है।

हर महीने यह रकम लगभग ₹6 लाख करोड़ बैठती है, जो कि पूरे देश में होने वाले कुल UPI लेन-देन का करीब 20% हिस्सा है।
इससे साफ है कि बड़े लेन-देन भले ही गिनती में कम हों, लेकिन बाजार के कैश-फ्लो में उनकी भूमिका सबसे अहम है।
दुकानदार अब क्या रास्ता निकालेंगे?
चूंकि अधिकतर व्यापारी खुद यह फीस नहीं देना चाहते, इसलिए उनके पास तीन रास्ते बचते हैं:
* वे बिल में अलग से एक्स्ट्रा चार्ज जोड़कर इसे सीधे ग्राहक से वसूलें।
* सामान या सेवाओं के दाम थोड़े बढ़ा दें।
* ग्राहकों को UPI के बजाय नकद पैसे (Cash) देने के लिए कहें।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नियम इसी तरह लागू हुआ, तो कुल यूपीआई लेन-देन की वैल्यू में 10% और लेन-देन की कुल संख्या में 4% तक की गिरावट आ सकती है।
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