24 hours custody rule: अक्सर हम फिल्मों में या असल जिंदगी में देखते हैं कि पुलिस किसी संदिग्ध व्यक्ति को पूछताछ के लिए उठा लेती है और कई-कई दिनों तक थाने में बिठाए रखती है।
जब उनका मन करता है, तब वे कागजों पर उसकी गिरफ्तारी दिखाते हैं और फिर उसे कोर्ट ले जाते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए पुलिस की इस मनमानी पर रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर पुलिस किसी को हिरासत में लेती है (यानी उसे अपने साथ ले जाती है और वह व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकता), तो उसी वक्त से 24 घंटे का काउंटडाउन शुरू हो जाएगा।
पुलिस यह बहाना नहीं बना सकती कि “हमने तो गिरफ्तारी कागजों पर कल दर्ज की है, इसलिए 24 घंटे कल से गिने जाएंगे।”

क्या है पूरा मामला? (त्रिपुरा का केस)
यह पूरा मामला त्रिपुरा से जुड़ा है, जहां 11 किलो से ज्यादा नशीली गोलियों (याबा टैबलेट) की जब्ती हुई थी।
इस मामले में पुलिस ने चार लोगों को 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे हिरासत में लिया।
लेकिन, उनकी औपचारिक (कागजी) गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दिखाई गई।
इसका सीधा मतलब था कि हिरासत में लेने और कागजों पर गिरफ्तारी दिखाने के बीच पूरे 21 घंटे का गैप था।
आरोपियों ने इसे गलत बताते हुए कहा कि हिरासत में लेने के 24 घंटे के अंदर उन्हें मजिस्ट्रेट (जज) के सामने पेश किया जाना चाहिए था।
जब त्रिपुरा हाईकोर्ट ने उनकी बात नहीं मानी, तो वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस उज्जवल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और आम आदमी के हकों को सुरक्षित रखने वाला यह बड़ा फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने दिए 5 सबसे अहम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) को ध्यान में रखते हुए ये 5 बातें साफ की हैं:
* कागजों के खेल पर रोक: पुलिस किसी को भी हिरासत में लेकर बिना कागजों में दिखाए उसे लंबे समय तक कैद में नहीं रख सकती।
ऐसा करना इंसान के अधिकारों का हनन है और इससे पुलिस की मनमानी बढ़ती है।
* कब से गिने जाएंगे 24 घंटे? 24 घंटे की समय-सीमा उसी पल से शुरू हो जाएगी, जब पुलिस व्यक्ति को असल में हिरासत में लेती है।
इसमें थाने से कोर्ट तक जाने के रास्ते का समय नहीं गिना जाएगा। बाकी 24 घंटे के भीतर जज के सामने पेश करना ही होगा।
* मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी बढ़ी: अब मजिस्ट्रेट (जज) सिर्फ पुलिस के कागजों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करेंगे। उन्हें खुद जांच करनी होगी कि व्यक्ति को असल में कब उठाया गया था।
इसके लिए सरकारी रिकॉर्ड, और जरूरत पड़ने पर सीसीटीवी (CCTV) फुटेज भी चेक किए जा सकते हैं।
* ठोस कारण बताना होगा: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 के तहत पुलिस को 24 घंटे तक हिरासत में रखने का भी एक जायज कारण बताना होगा।
एनडीपीएस (NDPS) जैसे सख्त कानून भी पुलिस को यह अधिकार नहीं देते कि वे इस नियम को तोड़ सकें।
* देरी हुई तो तुरंत रिहाई: अगर पुलिस 24 घंटे से ज्यादा समय तक किसी को बिना जज के सामने पेश किए रखती है, तो उस व्यक्ति को तुरंत रिहा करना होगा।
अगर जज को लगता है कि हिरासत में लेने का कारण सही नहीं है, तो वे 24 घंटे से पहले भी पुलिस को रिमांड देने से मना कर सकते हैं।

सवाल-जवाब में समझिए पुराने और नए नियम का फर्क
* सवाल 1: पहले पुलिस क्या करती थी?
जवाब: पुलिस संदिग्ध को हिरासत में ले लेती थी और आराम से पूछताछ करती थी।
जब उनका मन भर जाता था या जब एफआईआर (FIR) दर्ज होती थी, तब उस समय को गिरफ्तारी का समय बताकर वहां से 24 घंटे गिनना शुरू कर देती थी।
* सवाल 2: अब नए नियम से क्या बदलेगा?
जवाब: अब पुलिस हिरासत में लेने के समय से ही 24 घंटे गिने जाएंगे, कागजी गिरफ्तारी के समय से नहीं।
* सवाल 3: हिरासत (Custody) का असल मतलब क्या है?
जवाब: अगर पुलिस किसी व्यक्ति को अपने कंट्रोल में ले लेती है और वह अपनी मर्जी से घर नहीं जा सकता, तो उसे हिरासत माना जाता है।
कानूनी भाषा में समझें तो हर गिरफ्तारी में हिरासत शामिल होती है, लेकिन हर हिरासत गिरफ्तारी नहीं होती।
* सवाल 4: हिरासत का सही समय कैसे साबित होगा?
जवाब: सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, पुलिस को गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी में सही समय लिखना होगा।
अगर शक होता है, तो मजिस्ट्रेट खुद सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन या गवाहों के बयानों से इसकी जांच कर सकते हैं।

हिरासत या गिरफ्तारी के दौरान क्या हैं आपके अधिकार?
कानून ने हर नागरिक को कुछ अधिकार दिए हैं, जिन्हें जानना आपके लिए बहुत जरूरी है:
* 24 घंटे का नियम (अनुच्छेद 22): भारतीय संविधान के अनुसार, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर पास के मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
* कारण जानने का हक: आपको यह जानने का पूरा हक है कि आपको क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है। पुलिस को गिरफ्तारी का कारण लिखित में देना होता है। बिना कारण बताए गिरफ्तारी करना गैर-संवैधानिक है।
* वकील से मिलने का अधिकार: आपको अपनी पसंद के वकील से बात करने का अधिकार है (BNSS की धारा 38 के तहत)। अगर आपके पास वकील करने के पैसे नहीं हैं, तो सरकार आपको मुफ्त कानूनी मदद देती है।
* महिलाओं के लिए विशेष नियम: BNSS की धारा 43(5) के तहत किसी भी महिला को सूरज ढलने के बाद (रात में) और सूरज उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
अगर बहुत जरूरी स्थिति हो, तो पुलिस को पहले महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में मजिस्ट्रेट से स्पेशल परमिशन लेनी होगी।
* डीके बसु (DK Basu) गाइडलाइंस: सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में कुछ नियम बनाए थे जो आज भी लागू हैं। जैसे- गिरफ्तार करने वाले पुलिसवाले की नेमप्लेट साफ दिखनी चाहिए।
गिरफ्तारी के वक्त एक ‘अरेस्ट मेमो’ बनना चाहिए जिस पर किसी गवाह के साइन हों।
अगर गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर पर कोई चोट है, तो वह दर्ज होनी चाहिए।
साथ ही, व्यक्ति के परिवार या दोस्तों को तुरंत सूचना दी जानी चाहिए।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आम नागरिक के लिए एक बड़ी राहत है।
यह सुनिश्चित करता है कि जांच के नाम पर किसी भी बेगुनाह या संदिग्ध को बिना कानूनी प्रक्रिया के परेशान न किया जाए।
नियम सबके लिए बराबर हैं और पुलिस को भी दायरे में रहकर ही काम करना होगा।
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