Women reservation bill 2026: भारतीय संसदीय इतिहास में 17-18 अप्रैल 2026 की तारीख को एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में याद किया जाएगा।
पिछले 12 वर्षों में यह पहली बार हुआ है जब मोदी सरकार का कोई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया।
जिस ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर देश की आधी आबादी बड़ी उम्मीदें लगाए बैठी थी, वह सदन में जरूरी बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर सका।

इसके बाद देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
प्रियंका गांधी ने कहा लोकतंत्र की जीत
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस घटनाक्रम को एक अलग नजरिए से पेश किया है।
दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने इसे विपक्ष की एकजुटता और लोकतंत्र की बड़ी जीत बताया।
प्रियंका के तर्कों को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:
परिसीमन की आड़ में राजनीति:
प्रियंका गांधी का मुख्य आरोप यह है कि सरकार इस बिल के जरिए महिलाओं को हक देने के बजाय ‘परिसीमन’ (Delimitation) के नाम पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलकर राजनीतिक समीकरण साधना चाहती थी।
उनका मानना है कि यह बिल महिला सशक्तिकरण के बजाय सत्ता बचाने का एक हथियार था।

जल्दबाजी पर सवाल: उन्होंने सवाल उठाया कि जब चुनाव सिर पर हैं, तब अचानक सत्र बुलाकर सिर्फ एक दिन पहले सांसदों को बिल का मसौदा क्यों दिया गया?
उनके अनुसार, यह सरकार की एक सोची-समझी साजिश थी जिसमें बिल पास होता तो भी सरकार श्रेय लेती और गिर गया तो विपक्ष को दोष देने का बहाना मिल गया।
महिलाओं को ढाल बनाना: प्रियंका ने तीखे शब्दों में कहा कि सरकार महिलाओं को सिर्फ चुनाव जीतने के लिए ढाल बना रही है।
उन्होंने हाथरस, मणिपुर और महिला खिलाड़ियों के आंदोलनों का जिक्र करते हुए सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए।

2023 के बिल की मांग: कांग्रेस की मांग है कि जो बिल 2023 में पहले ही पारित हो चुका है, उसे बिना किसी ‘परिसीमन’ की शर्त के तुरंत लागू किया जाना चाहिए।
सरकार ने कहा- “70 करोड़ महिलाओं के साथ धोखा“
बिल गिरने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर कड़ा प्रहार किया।
अमित शाह ने सोशल मीडिया पर अपने गुस्से का इजहार करते हुए कहा कि विपक्ष का जश्न महिलाओं के अपमान जैसा है।


विश्वासघात का आरोप: अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी जैसे दलों ने मिलकर 70 करोड़ महिलाओं के सपनों को तोड़ा है।
उन्होंने इसे ‘नारी शक्ति’ के साथ किया गया विश्वासघात बताया।
आंकड़ों का खेल: सदन में मौजूद 352 सदस्यों में से 230 वोट बिल के खिलाफ पड़े।
बिल पास होने के लिए जरूरी बहुमत से 54 वोट पीछे रह गया।
सरकार का तर्क है कि विपक्ष कभी चाहता ही नहीं था कि महिलाओं को उनका हक मिले।

पीएम मोदी की चेतावनी:
प्रधानमंत्री मोदी ने कैबिनेट बैठक में स्पष्ट किया कि विपक्ष को इस ‘नकारात्मक’ सोच की कीमत 2029 के चुनावों में चुकानी होगी।
उन्होंने निर्देश दिया कि यह संदेश गांव-गांव तक पहुंचाया जाए कि विपक्ष ने महिला आरक्षण का विरोध किया है।

क्या है ‘परिसीमन’ का पेंच?
आम बोलचाल की भाषा में समझें तो परिसीमन का अर्थ है—देश की जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों (लोकसभा और विधानसभा सीटों) की सीमाओं को फिर से तय करना।
2023 के बिल में एक शर्त थी कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
विपक्ष का कहना है कि यह शर्त बिल को भविष्य के लिए टालने का एक तरीका है।

अगर सरकार चाहती तो मौजूदा सीटों पर ही 33% आरक्षण लागू कर सकती थी।
इसी विवाद के कारण सदन में सहमति नहीं बन पाई और बिल गिर गया।
OBC कोटा और अल्पसंख्यक राजनीति
इस पूरे मामले में एक और बड़ा पेच ‘कोटा के भीतर कोटा’ का है।
प्रियंका गांधी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) महिलाओं के लिए अलग से कोटे की समर्थक है।
उनका तर्क है कि बिना इसके, पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कभी भी सही प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा।
हालांकि, अल्पसंख्यक कोटे के सवाल पर उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन विपक्ष का यह रुख सरकार के बिल से अलग था।

आगे क्या होगा?
महिला आरक्षण बिल का गिरना केवल एक विधायी विफलता नहीं है, बल्कि यह 2029 के आम चुनावों की नींव भी है।
जहां एक तरफ भाजपा इसे ‘महिला विरोधी विपक्ष’ का मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाएगी, वहीं विपक्ष इसे ‘सरकार की नीयत में खोट’ और ‘संविधान बचाने की लड़ाई’ के रूप में पेश करेगा।
फिलहाल, 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर फाइलों और राजनीतिक बयानों में उलझ कर रह गया है।
जनता, विशेषकर देश की महिलाएं, अब यह देख रही हैं कि कौन वास्तव में उनके हक की बात कर रहा है और कौन सिर्फ राजनीति।
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