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ममता के दुर्ग में भाजपा की ऐतिहासिक ‘जीत’: अब कौन बनेगा बंगाल का मुख्यमंत्री? इन 5 चेहरों पर टिकी नजरें

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

West Bengal New CM: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा अध्याय जुड़ गया है जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक नामुमकिन लगती थी।

दशकों तक वामपंथी शासन और फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के ‘अजेय’ माने जाने वाले किले को ढहाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता की चाबी हासिल कर ली है।

यह जीत केवल चुनावी आंकड़ों की जीत नहीं है, बल्कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत है।

अब जब नतीजों ने साफ कर दिया है कि बंगाल में ‘भगवा’ राज आने वाला है, तो सबसे बड़ा सवाल जो हर बंगाली की जुबान पर है, वह यह कि— मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा?

अमित शाह का वादा और ‘भूमिपुत्र’ की तलाश

चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार एक ही बात दोहराई थी कि “भाजपा का मुख्यमंत्री कोई बाहरी (Outsider) नहीं, बल्कि इसी मिट्टी का लाल यानी ‘भूमिपुत्र’ होगा।”

यह ममता बनर्जी के ‘बोहिरागत’ वाले नैरेटि को काटने के लिए एक मास्टरस्ट्रोक था

अब जनता ने भाजपा को मौका दिया है, तो पार्टी को एक ऐसे चेहरे का चुनाव करना है जो न केवल पार्टी को एकजुट रखे, बल्कि बंगाल के बौद्धिक वर्ग और जमीनी कार्यकर्ताओं, दोनों को स्वीकार्य हो।

मुख्यमंत्री की इस रेस में फिलहाल पांच प्रमुख नाम चर्चा के केंद्र में हैं:

1. सुवेंदु अधिकारी: संघर्ष का पर्याय

अगर यह कहा जाए कि बंगाल में भाजपा को ‘जीत की आदत’ लगाने में सुवेंदु अधिकारी का सबसे बड़ा हाथ है, तो गलत नहीं होगा।

2020 में टीएमसी का साथ छोड़ने के बाद से सुवेंदु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

ताकत: सुवेंदु के पास ममता बनर्जी को उन्हीं के गढ़ नंदीग्राम में हराने का अनुभव है।

वे एक जबरदस्त वक्ता हैं और उनके पास पूरे राज्य में कार्यकर्ताओं का एक बड़ा नेटवर्क है।

दावेदारी: नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने ममता सरकार की घेराबंदी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

भाजपा आलाकमान उनके जुझारूपन और ‘जायंट किलर’ की छवि को देखते हुए उन्हें पहली पसंद मान सकता है।

2. सामिक भट्टाचार्य: भद्रलोक की पसंद

अगर भाजपा किसी ऐसे व्यक्ति को चुनना चाहती है जो विवादों से दूर रहे और जिसकी छवि एक ‘जेंटलमैन पॉलिटिशियन’ की हो, तो सामिक भट्टाचार्य का नाम सबसे ऊपर है।

ताकत: सामिक आरएसएस के पुराने समर्पित कार्यकर्ता हैं और उनकी बंगाली संस्कृति, साहित्य और राजनीति पर गहरी पकड़ है।

वे टीवी बहसों में भाजपा का पक्ष बहुत ही तार्किक तरीके से रखते आए हैं।

दावेदारी: बंगाल का मध्यमवर्ग और बुद्धिजीवी तबका सामिक जैसे सौम्य चेहरे को आसानी से स्वीकार कर सकता है।

वे संगठन और सरकार के बीच एक सेतु का काम कर सकते हैं।

3. दिलीप घोष: संगठन के शिल्पकार

दिलीप घोष वह नाम है जिसने उस दौर में बंगाल भाजपा की कमान संभाली थी जब राज्य में पार्टी के पास गिने-चुने कार्यकर्ता थे।

उनके कार्यकाल में ही भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर टीएमसी को हिला दिया था।

ताकत: घोष अपनी बेबाकी और आक्रामक शैली के लिए जाने जाते हैं।

कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता जबरदस्त है। उन्हें भाजपा के जमीनी आधार का निर्माता माना जाता है।

दावेदारी: हालांकि पिछले कुछ समय से वे केंद्र में सक्रिय थे, लेकिन उनकी संगठनात्मक क्षमता उन्हें सीएम पद की रेस में हमेशा बनाए रखती है।

4. सुकांता मजूमदार: युवा और अनुभवी चेहरा

उत्तर बंगाल से आने वाले सुकांता मजूमदार भाजपा के उन चेहरों में से हैं जिनकी छवि बहुत साफ-सुथरी है।

वर्तमान में वे केंद्रीय मंत्री हैं और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

ताकत: भाजपा की जीत में उत्तर बंगाल (नॉर्थ बंगाल) की सीटों का अहम रोल रहा है।

सुकांता को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी उत्तर बंगाल की जनता को एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है।

दावेदारी: वे शिक्षित हैं, शांत स्वभाव के हैं और मोदी-शाह की टीम के भरोसेमंद सदस्यों में गिने जाते हैं।

5. स्वपन दासगुप्ता: बौद्धिक चेहरा

राज्यसभा के पूर्व सांसद और वरिष्ठ पत्रकार स्वपन दासगुप्ता भाजपा के रणनीतिकारों में से एक हैं।

ताकत: दासगुप्ता के पास दिल्ली की राजनीति और बंगाल की जरूरतों का बेहतर तालमेल बिठाने की क्षमता है।

वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को बंगाल में लागू करने के लिए एक कुशल प्रशासक साबित हो सकते हैं।

दावेदारी: हालांकि उनके पास जमीनी चुनावी अनुभव कम है, लेकिन एक ‘विद्वान मुख्यमंत्री’ के रूप में वे भाजपा का चेहरा हो सकते हैं।

दिल्ली में होगा अंतिम फैसला

बंगाल की जीत भाजपा के लिए केवल एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि यह एक विचारधारा की जीत है।

अब गेंद भाजपा संसदीय बोर्ड के पाले में है।

क्या भाजपा सुवेंदु अधिकारी के संघर्ष को पुरस्कृत करेगी, या फिर सामिक भट्टाचार्य जैसे किसी नए चेहरे से सबको चौंका देगी?

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आने वाले कुछ दिनों में दिल्ली में होने वाली बैठकों के बाद साफ हो जाएगा कि बंगाल की नई सरकार का नेतृत्व कौन करेगा।

लेकिन एक बात तय है— बंगाल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी।

‘सोनार बांग्ला’ के सपने को हकीकत में बदलने की जिम्मेदारी अब भाजपा के कंधों पर है।

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