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नेताओं को इग्नोर करना अफसरों को पड़ेगा भारी: केंद्र ने कहा- सांसदों-विधायकों को ‘जी हुजूर’ नहीं, पर तमीज और समय जरूर दें

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Bureaucracy vs Politicians: मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासन के बीच की रस्साकशी अब दिल्ली के गलियारों तक पहुंच गई है।

राज्य में मंत्रियों, सांसदों और विधायकों द्वारा अधिकारियों पर लगाए जा रहे ‘अनदेखी’ के आरोपों को केंद्र सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया है।

भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के डिप्टी सेक्रेटरी जीके रजनीश ने मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन को एक कड़ा पत्र लिखा है।

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इस पत्र का सीधा संदेश है— “अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों के साथ व्यवहार करने का तरीका सिखाइए।”

विवाद की जड़ क्या है?

अक्सर देखा जाता है कि विधायक या सांसद जनता की समस्याओं को लेकर अधिकारियों को पत्र लिखते हैं, लेकिन कई बार इन पत्रों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

मध्यप्रदेश विधानसभा में लगभग हर सत्र में यह मुद्दा गूंजता है कि कलेक्टर, एसपी या अन्य विभाग के प्रमुख जनप्रतिनिधियों के फोन नहीं उठाते और न ही उनके पत्रों का जवाब देते हैं।

हाल के कुछ महीनों में जबलपुर, शिवपुरी और आलीराजपुर जैसी जगहों पर अफसरों और नेताओं के बीच सीधी भिड़ंत देखने को मिली, जिसके बाद यह मामला केंद्र तक पहुंचा।

केंद्र के नए और सख्त निर्देश (प्रोटोकॉल)

केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि अधिकारी अपनी मर्जी से काम नहीं कर सकते, उन्हें प्रोटोकॉल का पालन करना ही होगा।

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में कुछ जरूरी बातें कही गई हैं:

 1. जवाब देना मजबूरी है, विकल्प नहीं:

अगर किसी सांसद या विधायक का पत्र आता है, तो अधिकारी को उसका जवाब ‘विनम्रता’ और ‘स्पष्टता’ के साथ देना होगा।

टालने वाले या ‘बना-बनाया’ (रेडीमेड) जवाब भेजने पर अब कार्रवाई हो सकती है।

 2. कौन देगा जवाब?:

अगर पत्र किसी मंत्री को लिखा गया है, तो कोशिश होनी चाहिए कि मंत्री खुद जवाब दें।

अगर पत्र सचिव स्तर पर है, तो जवाब भी उसी गरिमा के अधिकारी द्वारा दिया जाना चाहिए।

 3. समय सीमा तय:

अगर किसी मामले में जानकारी जुटाने में समय लग रहा है, तो 15 दिनों के भीतर एक ‘अंतरिम जवाब’ (Interim Reply) देना होगा।

इसमें बताना होगा कि अंतिम जवाब कब तक मिल जाएगा।

 4. गलत विभाग तो भी जिम्मेदारी:

अगर पत्र गलत विभाग में पहुंच गया है, तो उसे 5 दिन के भीतर सही विभाग में ट्रांसफर करना अधिकारी की जिम्मेदारी है, और इसकी सूचना जनप्रतिनिधि को देनी होगी।

 5. जनता का नजरिया:

केंद्र ने कहा है कि हर आवेदन को केवल एक कागज का टुकड़ा न समझें, बल्कि उसे जनता की जरूरत के नजरिए से देखें।

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इस पूरे विवाद के पीछे हाल की तीन बड़ी घटनाएं हैं:

जबलपुर:

यहाँ आईएएस अरविंद शाह और मंत्री राकेश सिंह के बीच तीखी बहस की खबरें आईं। आरोप लगा कि मंत्री ने अधिकारी को अपमानित किया और धमकाया।

शिवपुरी:

बीजेपी विधायक प्रीतम लोधी ने एक युवा आईपीएस अधिकारी को खुलेआम धमकी दे दी कि ’15 दिन में जवाब दो वरना घर घेर लेंगे’

आलीराजपुर:

यहाँ एक मंत्री के भाई ने महिला जनपद सीईओ को ‘जिंदा गाड़ देने’ की धमकी दे दी।

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इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि राज्य में ‘सिस्टम’ और ‘सियासत’ के बीच तालमेल पूरी तरह बिगड़ चुका है।

अधिकारियों के लिए चेतावनी

यह चार महीने में दूसरी बार है जब केंद्र को हस्तक्षेप करना पड़ा है।

इससे पहले जनवरी 2026 में भी निर्देश दिए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिखा।

केंद्र ने अब राज्य सरकार से पूछा है कि पुराने निर्देशों पर क्या अमल हुआ?

यह संकेत है कि अगर अब भी रवैया नहीं बदला, तो संबंधित अधिकारियों पर गाज गिर सकती है।

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