Narak Chaturdashi 2026: दिवाली रोशनी और खुशियों का त्योहार है, और इसकी शुरुआत धनतेरस से ही हो जाती है।
धनतेरस के ठीक बाद और मुख्य दिवाली से एक दिन पहले जो त्योहार आता है, उसे हम नरक चतुर्दशी कहते हैं।
आम बोलचाल में इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस और कई जगहों पर काली चौदस भी कहा जाता है।
साल 2026 में यह खास दिन 7 नवंबर को मनाया जा रहा है।
यह दिन केवल दीये जलाने का नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की पूजा, यमराज के नाम का दीपक जलाने (दीपदान), साफ-सफाई और दान-पुण्य का दिन है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि नरक चतुर्दशी का महत्व क्या है, पूजा का सही समय क्या है और इस दिन किन खास बातों का ध्यान रखना चाहिए।
नरक चतुर्दशी 2026: कब है छोटी दिवाली और क्या है शुभ मुहूर्त?
हिंदू कैलेंडर (पंचांग) के अनुसार, नरक चतुर्दशी हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
साल 2026 में पूजा और स्नान के लिए जो शुभ मुहूर्त बन रहे हैं, वे इस प्रकार हैं:
* नरक चतुर्दशी की तारीख: 7 नवंबर 2026, रविवार
* चतुर्दशी तिथि शुरू: 7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे से
* चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर, सुबह 11:27 बजे तक
पूजा के खास मुहूर्त:
* अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 से दोपहर 12:26 बजे तक
* विजय मुहूर्त: दोपहर 1:53 से 2:37 बजे तक
* गोधूलि मुहूर्त: शाम 5:31 से 5:57 बजे तक
ध्यान रखें कि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में थोड़ा बहुत बदलाव होता है, इसलिए अपने शहर के हिसाब से समय में कुछ मिनटों का अंतर आ सकता है।
आखिर इसे छोटी दिवाली क्यों कहा जाता है?
इस त्योहार को छोटी दिवाली कहने के पीछे का कारण बहुत ही सीधा है।
यह मुख्य दीपावली से ठीक एक दिन पहले आती है और इस दिन से ही घरों में दीये जलाने का सिलसिला बड़े स्तर पर शुरू हो जाता है।
लोग अपने घरों की साफ-सफाई पूरी कर लेते हैं, आंगन में रंगोली बनाते हैं और शाम होते ही घर को दीयों की रोशनी से सजा देते हैं।
क्योंकि यह बड़ी दिवाली जैसी ही लगती है, बस इसमें पटाखों का शोर और पूजा का स्तर थोड़ा कम होता है, इसलिए इसे ‘छोटी दिवाली’ का नाम दे दिया गया है।
नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा: कैसे पड़ा यह नाम?
नरक चतुर्दशी का सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण और एक अत्याचारी राक्षस नरकासुर से है।
पुरानी कथाओं के मुताबिक, नरकासुर नाम के असुर को अपनी शक्तियों पर बहुत घमंड हो गया था। उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था।
देवताओं से लेकर आम लोग तक उसके अत्याचार से परेशान थे। उसने 16 हजार से ज्यादा कन्याओं को बंदी बना लिया था।
जब नरकासुर का आतंक बहुत बढ़ गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर प्राग्ज्योतिषपुर (नरकासुर की राजधानी) पर हमला किया।
वहां हुए युद्ध में श्रीकृष्ण ने उस अत्याचारी राक्षस का वध कर दिया और सभी बंदी कन्याओं को उसकी कैद से आजाद कराया।
जिस दिन यह जीत हासिल हुई, वह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का दिन था।
इसी खुशी में लोगों ने दीये जलाए और तभी से इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाने लगा।
रूप चौदस और अभ्यंग स्नान: क्यों लगाते हैं तेल और उबटन?
नरक चतुर्दशी को ‘रूप चौदस’ भी कहा जाता है। इसके पीछे एक बहुत ही पुरानी और खास परंपरा है— ‘अभ्यंग स्नान’।
अभ्यंग स्नान का मतलब है शरीर पर तेल और उबटन लगाकर नहाना।
इस दिन लोग सुबह सूरज उगने से पहले उठते हैं। पूरे शरीर पर तिल का तेल या सरसों का तेल लगाते हैं और फिर जड़ी-बूटियों से बना उबटन लगाकर नहाते हैं।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने जब नरकासुर का वध किया था, तब उनके शरीर पर उस राक्षस का खून लग गया था। उसे साफ करने के लिए उन्होंने तेल और उबटन लगाकर स्नान किया था।
आज के समय में इसे स्वच्छता और स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है। सर्दियों की शुरुआत हो रही होती है, ऐसे में तेल की मालिश और उबटन त्वचा को रूखेपन से बचाता है और निखार लाता है। इसी निखार के कारण इसे रूप चौदस कहा जाता है।
छोटी दिवाली पर कैसे करें श्रीकृष्ण और यमराज की पूजा?
इस दिन मुख्य रूप से दो तरह की पूजा होती है— एक भगवान श्रीकृष्ण की और दूसरी यमराज की।
श्रीकृष्ण की पूजा:
अपने घर के मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें।
उन्हें ताजे फूल अर्पित करें, मिठाई या प्रसाद का भोग लगाएं। इसके बाद उनके सामने घी या तेल का दीपक जलाएं।
पूजा के समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करना बहुत ही शुभ माना जाता है। मन में प्रार्थना करें कि जिस तरह उन्होंने दुनिया से बुराई (नरकासुर) को मिटाया, वैसे ही आपके जीवन से भी हर तरह के कष्ट और नकारात्मकता को दूर करें।
यमराज के लिए दीपदान:
छोटी दिवाली की शाम को यमराज (मृत्यु के देवता) के नाम का दीपक जलाने की पुरानी परंपरा है। इसे ‘यम दीपदान’ कहते हैं।
शाम के समय घर के मुख्य दरवाजे के बाहर, दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके एक चौमुखी (चार बत्तियों वाला) दीपक जलाया जाता है।
ऐसी मान्यता है कि यह दीपक यमराज को समर्पित होता है ताकि अकाल मृत्यु का भय दूर हो और परिवार के सभी सदस्यों को अच्छी सेहत और लंबी उम्र मिले।
नरक चतुर्दशी पर दान-पुण्य क्यों है जरूरी?
भारतीय त्योहारों का असली मतलब सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को खुशियों में शामिल करना है।
नरक चतुर्दशी के दिन जरूरतमंदों की मदद करने को बहुत ही शुभ माना गया है।
इस दिन आप अपनी हैसियत के हिसाब से गरीब लोगों को अन्न, कपड़े, या मिठाइयां दान कर सकते हैं।
जब आप किसी जरूरतमंद की मदद करते हैं, तो उससे समाज में एक-दूसरे के प्रति प्यार और सहयोग की भावना बढ़ती है।
दीवाली की असली खुशी तभी है जब आपके साथ-साथ आपके आस-पास के लोग भी त्योहार मना सकें।
त्योहार मनाते समय किन बातों का रखें खास ध्यान?
* सुरक्षा पहले: शाम को जब घर में या मुख्य द्वार पर दीपक जलाएं, तो उसे ऐसी जगह रखें जहां से किसी के कपड़े न छुएं। छोटे बच्चों और घर के पालतू जानवरों को जलते हुए दीयों से दूर रखें।
* स्वच्छता: रूप चौदस शरीर की सफाई के साथ-साथ घर और मन की सफाई का भी दिन है। घर में कबाड़ या टूटी-फूटी चीजें न रखें।
* अंधविश्वास से दूर रहें: यमराज के नाम का दीपक एक धार्मिक परंपरा है। इसे किसी डर या अंधविश्वास से न जोड़ें। यह केवल लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की एक सकारात्मक कामना है।
* सकारात्मक सोच: नरक चतुर्दशी हमें यही सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सच्चाई और अच्छाई की हमेशा जीत होती है। अपने मन से बुरे विचारों को निकालें और सकारात्मकता को अपनाएं।
कुल मिलाकर, छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी सिर्फ एक रस्म नहीं है।
यह बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने, खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से साफ रखने और समाज में खुशियां बांटने का एक बेहतरीन मौका है।
#NarakChaturdashi2026 #ChhotiDiwali #RoopChaudas #KaliChaudas #DiwaliFestivities #AbhyangaSnan #Deepawali
