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56 साल बाद भोपाल के ऐतिहासिक इज्तिमा बाजार में बड़ा बदलाव: अब वक्फ बोर्ड करेगा संचालन, सबको मिलेगा दुकान लगाने का मौका

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Bhopal Ijtima Bazar: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का ऐतिहासिक इज्तिमा बाजार अपनी एक नई शुरुआत करने जा रहा है।

पिछले 56 सालों से इस मशहूर बाजार को दारुल शफकत सोसाइटी चला रही थी, लेकिन अब इसकी पूरी जिम्मेदारी मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड ने अपने हाथों में ले ली है।

सबसे अच्छी बात यह है कि सोसाइटी ने बिना किसी दबाव के, आपसी सहमति से बाजार का प्रबंधन वक्फ बोर्ड को सौंप दिया है।

7 दिसंबर 2026 से 6 फरवरी 2027 तक लगने वाले इस बाजार की रौनक इस बार कुछ अलग ही होगी, क्योंकि इसके संचालन के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव किए गए हैं।

खत्म हुआ 20 साल पुराना एकाधिकार, अब सबको मिलेगा मौका

पहले इस बाजार में दुकानें हासिल करना नए व्यापारियों के लिए किसी सपने जैसा था।

पिछले 20 सालों से एक ही तरह की व्यवस्था चल रही थी- जिसने एक बार दुकान ले ली, अगले साल उसी को प्राथमिकता दी जाती थी।

किराया 10 से 15 प्रतिशत बढ़ाकर पुरानी रसीद के आधार पर नई रसीद काट दी जाती थी।

यहां तक कि कई बार दुकानें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ट्रांसफर हो जाती थीं।

वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल ने स्पष्ट किया है कि अब यह एकाधिकार पूरी तरह से खत्म किया जा रहा है।

बोर्ड के इतिहास में पहली बार दुकानों के आवंटन के लिए सार्वजनिक निविदा (टेंडर) निकाले गए हैं। 29 अक्टूबर को इसकी सूचना भी जारी कर दी गई है।

इसका सीधा फायदा उन नए व्यापारियों को मिलेगा जो सालों से इस बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे।

अब पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होगी और हर व्यापारी को दुकान लगाने का समान अवसर मिलेगा।

इसके अलावा, बाजार में बिजली, साफ-सफाई और सुरक्षा (सीसीटीवी कैमरे) के लिए भी अलग-अलग टेंडर बुलाए गए हैं ताकि व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रहे।

विवाद का अंत और सोसाइटी का बड़ा फैसला

बाजार की जमीन और इसके प्रबंधन को लेकर दारुल शफकत सोसाइटी और वक्फ बोर्ड के बीच काफी समय से विवाद चल रहा था।

मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया था। सोसाइटी की कार्यकारिणी के सदस्य परवेज खान ने बताया कि जनरल बॉडी और कार्यकारिणी ने लंबी चर्चा के बाद यह महसूस किया कि अगर इस संपत्ति को वक्फ की संपत्ति नहीं माना गया, तो भविष्य में इसे सरकारी संपत्ति घोषित किया जा सकता है।

ऐसा होने पर यह पूरी संपत्ति और संस्था समुदाय के हाथ से हमेशा के लिए निकल जाती।

इसी आशंका को देखते हुए सोसाइटी ने अपना हाईकोर्ट का केस वापस ले लिया और पूरी संपत्ति को वक्फ बोर्ड के हवाले करने की लिखित सहमति दे दी।

वित्तीय पारदर्शिता: 2005 से अब तक का हिसाब

प्रबंधन सौंपने के साथ ही सोसाइटी ने वित्तीय पारदर्शिता भी दिखाई है।

परवेज खान के मुताबिक, सोसाइटी साल 2005 से लेकर अब तक के सभी ऑडिटेड अकाउंट्स, चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) की रिपोर्ट और बाजार से जुड़े सारे वित्तीय दस्तावेज वक्फ बोर्ड को सौंपने जा रही है।

पहले वक्फ बोर्ड का अनुमान था कि बाजार से करीब 28 करोड़ रुपए की आमदनी होती है, लेकिन सोसाइटी का तर्क था कि बोर्ड को दिया जाने वाला ‘निगरानी चंदा’ केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक आय के आधार पर तय होना चाहिए।

सच्चाई सामने रखने के लिए ही सोसाइटी ने पूरा ऑडिटेड हिसाब बोर्ड को देने का फैसला किया है।

साथ ही, सोसाइटी ने पुराने सभी दुकानदारों के नाम, मोबाइल नंबर और अन्य जरूरी दस्तावेजों का रिकॉर्ड भी बोर्ड को दे दिया है।

यतीमखाने के बच्चों का क्या होगा?

इस बाजार से होने वाली आमदनी का सबसे बड़ा और नेक काम यतीमखाने का संचालन था।

बाजार की कुल आय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा दारुल शफकत सोसाइटी द्वारा चलाए जा रहे अनाथालय (यतीमखाने) के बच्चों की परवरिश और देखरेख पर खर्च होता था।

अब जब बाजार वक्फ बोर्ड के पास चला गया है, तो सोसाइटी ने बोर्ड से गुजारिश की है कि नई व्यवस्था में भी यतीमखाने का बजट न रोका जाए।

बोर्ड ने भी इस पर सकारात्मक रुख दिखाते हुए मौखिक आश्वासन दिया है कि सोसाइटी अपना बजट बनाकर पेश करे, उसी के अनुसार यतीमखाने के लिए रकम आवंटित कर दी जाएगी।

बाजार में भेदभाव नहीं, सभी धर्मों के लोग करते हैं व्यापार

कई लोगों के मन में यह गलतफहमी रहती है कि यह बाजार किसी एक विशेष समुदाय के लिए है। सोसाइटी ने इस बात का पूरी तरह से खंडन किया है।

परवेज खान ने स्पष्ट किया कि पहले भी बाजार में करीब 35 प्रतिशत दुकानें गैर-मुस्लिम व्यापारियों को आवंटित की जाती थीं।

यह बाजार भोपाल की गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा है और यहां धर्म के आधार पर कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ।

क्या है इज्तिमा बाजार का इतिहास?

भोपाल का इज्तिमा बाजार सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि शहर की एक पुरानी पहचान है।

इसकी शुरुआत आलमी तब्लीगी इज्तिमा (एक बड़ा धार्मिक सम्मेलन) के साथ ताजुल मसाजिद परिसर में हुई थी।

इज्तिमा में देश और दुनिया भर से लाखों लोग हिस्सा लेने भोपाल आते थे।

इतने सारे जायरीनों (यात्रियों) और स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए धीरे-धीरे वहां एक बड़ा बाजार सजने लगा।

वक्त के साथ जब भीड़ बढ़ने लगी, तो इज्तिमा का मुख्य आयोजन शहर से दूर ईंटखेड़ी में शिफ्ट कर दिया गया।

लेकिन बाजार अपनी पुरानी जगह, ताजुल मसाजिद परिसर में ही लगता रहा।

लगभग दो महीने तक चलने वाले इस विंटर मार्केट में गर्म कपड़े, जूते-चप्पल, कंबल और घर के इस्तेमाल की हर छोटी-बड़ी चीज बेहद किफायती दामों पर मिलती है।

आज यह बाजार सिर्फ बाहर से आने वाले यात्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भोपाल और आसपास के जिलों के आम लोगों की सर्दियों की खरीदारी का सबसे पसंदीदा और प्रमुख केंद्र बन चुका है।

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