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दावे बड़े-बड़े, पर क्लासरूम खाली: मध्य प्रदेश के ट्राइबल स्कूलों में राम भरोसे बच्चों की पढ़ाई!

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Tribal School Teacher Crisis: मध्य प्रदेश में नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए दो सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है।

बीते 16 जून से सूबे के जनजातीय (ट्राइबल) क्षेत्रों के स्कूलों में घंटियां बज रही हैं, बच्चे उत्साह के साथ बस्ता टांगकर रोज स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन क्लासरूम में उनका स्वागत करने के लिए ‘गुरुजी’ ही गायब हैं।

सरकार एक तरफ जहां डिजिटल हाजिरी (E-Attendance), कड़ी मॉनिटरिंग और हाई-टेक सरकारी स्कूलों के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं प्रदेश के सुदूर आदिवासी अंचलों की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।

स्थिति यह है कि कई स्कूलों में ताला खोलने से लेकर बच्चों को पढ़ाने तक की जिम्मेदारी किसी एक अकेले शिक्षक के भरोसे है, तो कई जगह पूरी की पूरी कक्षाएं बिना शिक्षक के ही चल रही हैं।

तबादलों की नीति ने खड़ी की नई मुसीबत

इस साल स्कूलों में शिक्षकों की यह कमी अचानक नहीं हुई है, बल्कि विभाग की लचर व्यवस्था इसका मुख्य कारण है।

हाल ही में शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग में बड़े पैमाने पर शिक्षकों के स्थानांतरण (तबादले) किए गए। प्रशासनिक फेरबदल के चलते कई शिक्षक अपने पुराने स्कूलों को छोड़कर नई जगहों पर चले गए।

लेकिन परेशानी की बात यह रही कि जिन स्कूलों से शिक्षकों का तबादला हुआ, वहां उनकी जगह नए शिक्षकों की तैनाती की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई।

नियमित भर्ती की प्रक्रिया पहले से ही कछुआ गति से चल रही है, जिसके कारण रिक्त पदों का ग्राफ लगातार बढ़ता चला गया।

अतिथि शिक्षकों की भर्ती में लेतीफरी का खामियाजा भुगत रहे बच्चे

हर साल नियमित शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ‘अतिथि शिक्षकों’ (Guest Teachers) की सेवाएं लेती है।

नियम के मुताबिक, नया सत्र शुरू होने के साथ ही या उससे पहले ही अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए, ताकि बच्चों की पढ़ाई का एक भी दिन खराब न हो।

लेकिन इस बार सत्र शुरू होने के पखवाड़े भर बाद भी विभाग सोया हुआ है। अतिथि शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

इस प्रशासनिक ढीलेपन का सीधा और बुरा असर उन मासूम बच्चों पर पड़ रहा है जो भविष्य संवारने की उम्मीद में स्कूल आते हैं, लेकिन दिनभर बिना पढ़ाई किए वापस घर लौट जाते हैं।

वनवासी क्षेत्रों के छात्रों का भविष्य अधर में

सबसे बदतर हालात प्रदेश के सुदूर और ग्रामीण वनवासी इलाकों के स्कूलों के हैं।

इन क्षेत्रों में पहले से ही बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है, और अब शिक्षकों की कमी ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है।

जून का महीना खत्म होने को है, ऐसे में नए बच्चों के दाखिले (Admissions), उनका नामांकन और शुरुआती पढ़ाई पूरी तरह ठप पड़ी है।

शिक्षाविदों का मानना है कि यदि समय रहते स्कूलों में शिक्षकों की व्यवस्था नहीं की गई, तो बच्चों का सिलेबस (पाठ्यक्रम) काफी पिछड़ जाएगा।

इसका सीधा असर न केवल उनकी छमाही और वार्षिक परीक्षाओं के परिणामों पर पड़ेगा, बल्कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

स्थानांतरण और खाली पदों की वजह से आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह चौपट हो रही है। छात्रहित को ध्यान में रखते हुए जनजातीय कार्य विभाग को बिना किसी देरी के तत्काल अतिथि शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।”

डीके सिंगोरे, प्रांताध्यक्ष (ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन)

आयुक्त को पत्र, पर व्यवस्था अब भी अधूरी

इस गंभीर संकट को देखते हुए ‘ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन’ ने मोर्चा खोल दिया है।

एसोसिएशन ने जनजातीय कार्य विभाग के आयुक्त को एक औपचारिक पत्र सौंपकर प्राथमिक, माध्यमिक, हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्तर के सभी विद्यालयों में खाली पड़े पदों पर तुरंत अतिथि शिक्षकों की भर्ती शुरू करने की गुहार लगाई है।

हालांकि, इस चेतावनी और आग्रह के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी अब तक गहरी नींद से नहीं जागे हैं।

बड़ा सवाल: आखिर सरकार की प्राथमिकताओं में शिक्षा और शिक्षक सबसे ऊपर क्यों नहीं हैं? डिजिटल मॉनिटरिंग और ई-अटेंडेंस जैसी व्यवस्थाएं तब तक बेमानी हैं, जब तक कि क्लासरूम में बच्चों को अक्षर ज्ञान देने के लिए शिक्षक ही मौजूद न हों।

अब देखना यह होगा कि विभाग कब जागता है और कब इन आदिवासी बच्चों को उनके ‘गुरुजी’ वापस मिलते हैं।

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