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अब रात में बिकेगी सूरज की धूप! अंतरिक्ष में शीशे लगाकर धरती को चमकाने की तैयारी

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Space Sunlight Project: विज्ञान और तकनीक की दुनिया में आए दिन नए-नए चमत्कार देखने को मिलते हैं, लेकिन अब एक ऐसी तकनीक पर काम हो रहा है जो रात और दिन के फर्क को मिटा सकती है।

अमेरिकी स्पेस टेक्नोलॉजी स्टार्टअप कंपनी ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ (Reflect Orbital) एक बेहद अनोखी योजना पर काम कर रही है।

कंपनी की तैयारी धरती के चुनिंदा हिस्सों में रात के समय सूरज की रोशनी पहुंचाने और उसे बेचने की है।

इस असंभव से दिखने वाले काम को पूरा करने के लिए पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में बड़े-बड़े शीशे (मिरर सैटेलाइट) लगाए जाएंगे।

ये शीशे अंतरिक्ष में सूरज की रोशनी को सोखकर धरती के उन इलाकों में परावर्तित (Reflect) करेंगे जहाँ रात का अंधेरा होगा।

भारतीय कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ निभाएगी अहम भूमिका

इस क्रांतिकारी प्रोजेक्ट को हकीकत में बदलने के लिए कैलिफोर्निया की इस स्टार्टअप कंपनी ने भारत की प्राइवेट स्पेस कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ (Skyroot Aerospace) से हाथ मिलाया है।

हैदराबाद स्थित स्काईरूट और रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के बीच दो सैटेलाइट लॉन्च करने का आधिकारिक समझौता (कॉन्ट्रैक्ट) हुआ है।

इन सैटेलाइट्स को स्काईरूट के अपने स्वदेशी ‘विक्रम’ सीरीज के रॉकेट्स से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

पहला सैटेलाइट ‘विक्रम-1’ रॉकेट से लॉन्च होगा, जबकि दूसरा सैटेलाइट अतिरिक्त बूस्टर्स से लैस ‘विक्रम-1U’ रॉकेट के जरिए कक्षा में स्थापित किया जाएगा।

स्काईरूट एयरोस्पेस के सीईओ पवन चंदाना ने इस साझेदारी पर खुशी जताते हुए कहा कि रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल अंतरिक्ष तकनीक का एक बहुत ही नया और व्यावहारिक उपयोग करने जा रही है।

हम अपने रॉकेट के जरिए धरती पर जरूरत के मुताबिक सूरज की रोशनी पहुंचाने की इस योजना का हिस्सा बनने के लिए बेहद उत्साहित हैं।

वहीं रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के सीईओ बेन नोवैक का कहना है कि स्काईरूट जैसी उभरती कंपनियों के साथ काम करने से अंतरिक्ष तक पहुंचना और अधिक सुलभ और किफायती हो जाएगा।

कैसे काम करेगी यह तकनीक और क्या होंगे फायदे?

रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल को हाल ही में अमेरिका की फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) से अपना पहला प्रदर्शन सैटेलाइट बनाने, लॉन्च करने और संचालित करने का लाइसेंस मिला है।

कंपनी की योजना के मुताबिक:

* 5 किलोमीटर के दायरे में रोशनी: सैटेलाइट के जरिए धरती पर करीब 5 किलोमीटर के इलाके में सूरज की रोशनी फेंकी जा सकेगी।

* रोशनी पर पूरा नियंत्रण: इस रोशनी को जरूरत के हिसाब से चालू या बंद किया जा सकेगा और इसकी चमक (Brightness) को भी कम या ज्यादा किया जा सकेगा।

* आपदा प्रबंधन में मददगार: बाढ़, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय जब बिजली गुल हो जाती है, तब खोज और बचाव (Search and Rescue) अभियानों के लिए यह रोशनी वरदान साबित होगी।

* सोलर एनर्जी का उत्पादन बढ़ेगा: रात के समय भी सोलर पैनल्स पर सूरज की किरणें डालकर सौर ऊर्जा (Solar Power) बनाई जा सकेगी, जिससे बिजली उत्पादन का दायरा बढ़ जाएगा।

* औद्योगिक और सैन्य इस्तेमाल: दूर-दराज या दुर्गम इलाकों में रात के समय काम जारी रखने और रक्षा अभियानों के दौरान रणनीतिक स्थानों को रोशन करने में भी इसका उपयोग किया जा सकेगा।

1993 में रूस ने किया था पहला सफल प्रयोग

अंतरिक्ष से धरती पर रोशनी भेजने का विचार एकदम नया नहीं है। वर्ष 1993 में रूसी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने ‘ज़नाम्या’ (Znamya) नाम का एक प्रयोग किया था।

उन्होंने अंतरिक्ष में 65 फीट चौड़ा एक शीशा तैनात किया था, जिसने धरती पर सूरज की रोशनी की एक चमकती हुई किरण भेजी थी।

वह प्रयोग सफल रहा था, लेकिन आर्थिक तंगी और भारी बजट की वजह से उस प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ाया जा सका।

पर्यावरण और खगोलविदों की चिंताएं

जहाँ एक तरफ यह तकनीक बेहद उपयोगी नजर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ इसे लेकर विवाद भी शुरू हो गए हैं।

कई पर्यावरण संगठनों और वैज्ञानिकों ने इस प्रोजेक्ट पर चिंता जताई है।

* वन्यजीवों पर असर: रात के समय अचानक तेज रोशनी होने से पशु-पक्षियों की प्राकृतिक दिनचर्या और उनका व्यवहार प्रभावित हो सकता है।

* जैविक घड़ी (Circadian Rhythm): इंसानों और पेड़-पौधों की कुदरती जैविक घड़ी पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।

* खगोल विज्ञान में बाधा: रात में आसमान में अतिरिक्त रोशनी होने से अंतरिक्ष यात्रियों और खगोलविदों (Astronomers) को दूरदराज के तारों और ग्रहों का अध्ययन करने में परेशानी होगी।

तमाम विवादों के बावजूद, रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का कहना है कि वे स्थानीय समुदायों, वैज्ञानिकों और नियामकों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।

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