HomeTrending Newsमरी हुई बहन को बैंक लाने की मजबूरी: एक अनपढ़ आदिवासी की...

मरी हुई बहन को बैंक लाने की मजबूरी: एक अनपढ़ आदिवासी की कहानी, जिसने इंसानियत को किया शर्मसार

और पढ़ें

Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Odisha Jitu Munda Case: ओडिशा के क्योंझर जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो हमारे समाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े करती है।

यह कहानी जीतू मुंडा की है, जो एक सीधा-साधा आदिवासी है।

जीतू अनपढ़ है, उसे दुनियादारी के नियम-कायदे नहीं पता, लेकिन उसे इतना पता था कि उसकी बड़ी बहन कालरा मुंडा के बैंक खाते में जमा 20 हजार रुपए उसकी गरीबी दूर करने का एकमात्र सहारा हैं।

बैंक के चक्कर और कर्मचारियों की बेरुखी

कालरा मुंडा की मौत 26 जनवरी 2026 को हो चुकी थी।

जीतू को पैसों की सख्त जरूरत थी। वह कई बार मल्लिपसी स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंक गया।

उसने बैंक कर्मचारियों को बताया कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन बैंक के बाबू अपनी कागजी जिद पर अड़े रहे।

जीतू का आरोप है कि उसे बार-बार यही कहा गया— “पैसे चाहिए तो खाताधारक (बहन) को साथ लेकर आओ।”

कब्र से बैंक तक का खौफनाक सफर

एक तरफ भूख और तंगी थी, दूसरी तरफ बैंक के नियम।

जीतू को लगा कि शायद जब तक वह अपनी बहन को बैंक नहीं दिखाएगा, उसे पैसे नहीं मिलेंगे।

हताशा में उसने वह किया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसने अपनी बहन की कब्र खोदी और वहां से उसका कंकाल निकाला।

जीतू ने उस कंकाल को अपने कंधे पर रखा और तपती धूप में 3 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंच गया।

बैंक में मची अफरा-तफरी

जैसे ही जीतू बैंक के बरामदे में अपनी बहन की हड्डियों का ढांचा लेकर पहुंचा, वहां मौजूद लोगों की चीखें निकल गईं।

बैंक के कर्मचारी और ग्राहक डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। किसी ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।

सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जीतू को शांत कराया।

कानून से अनजान जीतू की बेबसी

पुलिस जांच में सामने आया कि जीतू पूरी तरह निर्दोष और मासूम है।

उसे नहीं पता था कि ‘डेथ सर्टिफिकेट’ क्या होता है या ‘नॉमिनी’ के जरिए पैसे कैसे निकाले जाते हैं।

उसकी बहन के पति और बेटे की पहले ही मौत हो चुकी थी, इसलिए जीतू ही उसका इकलौता वारिस था।

लेकिन बैंक अधिकारी उसे सही प्रक्रिया समझाने के बजाय उसे टरकाते रहे, जिसका नतीजा इस खौफनाक मंजर के रूप में सामने आया।

अब क्या हुआ?

थाने के प्रभारी किरण प्रसाद साहू ने बताया कि प्रशासन अब जीतू की मदद कर रहा है।

उसे कानूनी उत्तराधिकारी बनने की प्रक्रिया समझाई जा रही है ताकि उसे उसकी बहन के पैसे मिल सकें।

पुलिस की मौजूदगी में बहन के अवशेषों को दोबारा पूरे सम्मान के साथ दफना दिया गया है।

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी क्या हमारे नियम इतने जटिल हैं कि एक गरीब को अपना हक पाने के लिए मौत के बाद भी अपनों को चैन से सोने नहीं देने की मजबूरी झेलनी पड़े?

- Advertisement -spot_img