Women’s Reservation Bill 2029: भारत की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव की पटकथा लिखी जा चुकी है।
केंद्र सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को साल 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले जमीन पर उतारने की तैयारी में है।
सबसे बड़ी समस्या नई जनगणना और परिसीमन को दूर करने के लिए सरकार ने एक नया रास्ता खोज निकाला है।
क्या है सरकार का नया फॉर्मूला?
मौजूदा कानून के अनुसार, महिला आरक्षण को नई जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के आधार पर लागू किया जाना था।
चूंकि अगली जनगणना 2026-27 तक खिंच सकती है, इसलिए 2029 के चुनाव में इसे लागू करना मुश्किल दिख रहा था।
अब सरकार इस ‘अनिवार्य शर्त’ को हटाने के लिए संसद के इसी सत्र में दो नए संशोधन बिल ला सकती है।

प्रस्ताव यह है कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों को ही आधार मानकर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए।
इससे समय की बचत होगी और 2029 के आम चुनाव में महिलाओं को उनका 33% हक मिल सकेगा।
लोकसभा सीटों का गणित: 543 से 816 का सफर
इस नए बदलाव के बाद भारतीय संसद का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा।
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं। नए प्रस्ताव के तहत इनकी संख्या बढ़ाकर 816 की जा सकती है।
- कुल सीटें: 816
- महिला आरक्षित सीटें (33%): 273
- एससी/एसटी कोटा: आरक्षित सीटों के भीतर ही अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए उप-कोटा होगा।

सीटों का फैसला कैसे होगा? (लॉटरी और रोटेशन सिस्टम)
अक्सर यह सवाल उठता है कि कौन सी सीट महिला के लिए आरक्षित होगी और कौन सी पुरुष के लिए।
इसके लिए सरकार लॉटरी सिस्टम अपनाने पर विचार कर रही है।
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रोटेशन: हर 15 साल (यानी तीन लोकसभा चुनाव) के बाद आरक्षित सीटों को बदला जाएगा।
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फायदा: इससे हर क्षेत्र की महिलाओं को प्रतिनिधित्व का मौका मिलेगा और किसी एक सीट पर स्थायी कब्जा नहीं रहेगा।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 19 सितंबर 2023 को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश किया था।
सरकार ने इसे नारी शक्ति वंदन विधेयक कहा था।
#RajyaSabha takes up #WomenReservationBill for consideration and passing. The Bill seeks to provide one third reservation to women in #LokSabha and State Assemblies.
Union Law and Justice Minister @arjunrammeghwal moves the Constitution (One Hundred and Twenty-Eight Amendment)… pic.twitter.com/v4kWT9KWhF
— All India Radio News (@airnewsalerts) September 21, 2023
राजनीतिक हलचल और विपक्ष का साथ
गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए सक्रिय हैं।
उन्होंने हाल ही में एनडीए के सहयोगियों के साथ-साथ सपा, आरजेडी, एनसीपी और एआईएमआईएम जैसे विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात की है।
चूंकि संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, इसलिए सरकार विपक्षी खेमे, विशेषकर कांग्रेस से भी चर्चा की तैयारी में है।

लोकसभा में कुल 75 महिला सांसद
- पश्चिम बंगाल- 11 सभी टीएमसी सांसद
- उत्तर प्रदेश – 7 सपा- 5, भाजपा-1, अपना दल-1
- महाराष्ट्र – 7 कांग्रेस – 4, भाजपा- 2, एनसीपीएसपी – 1
- उत्तराखंड-1 भाजपा
- त्रिपुरा-1 भाजपा
- तेलंगाना – 2 भाजपा- 1, कांग्रेस-1
- तमिलनाडु – 5 कांग्रेस – 2, डीएमके- 3
- राजस्थान – 3 कांग्रेस – 1, बीजेपी-2
- पंजाब- 1 शि. अकाली दल
- ओडिशा- 4 सभी भाजपा
- दिल्ली (NCT) – -2 2 सभी भाजपा
- मध्य प्रदेश – 6 सभा भाजपा
- असम-1 भाजपा
- केरल-1 कांग्रेस
- कर्नाटक – 3 कांग्रेस – 2, भाजपा- 1
- झारखंड- 2 भाजपा – 1, जेएमएम-1
- हिमाचल प्रदेश-1 भाजपा
- हरियाणा – 1 कांग्रेस
- गुजरात – 4 भाजपा- 3, कांग्रेस- 1
- छत्तीसगढ़ – 3 भाजपा- 2, कांग्रेस-1
- बिहार – 5 जदयू- 1, आरजेडी – 1
- आंध्र प्रदेश- 3 बीजेपी- 1, YSR-1, टीडीपी- 1
- 7 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश से एक भी महिला सांसद नहीं
- राज्य – गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश
- केंद्र शासित प्रदेश- जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, लक्षद्वीप, पुडुचेरी
1931 से 2023 तक महिला आरक्षण की टाइमलाइन
महिला आरक्षण की लड़ाई करीब एक सदी पुरानी है:
- 1931: सरोजिनी नायडू और बेगम शाह नवाज ने पहली बार समानता की मांग उठाई।
- 1974: पंचायत स्तर पर आरक्षण की सिफारिश हुई।
- 1993: 73वें और 74वें संशोधन से पंचायतों में 33% आरक्षण मिला।
- 1996: एचडी देवेगौड़ा सरकार पहली बार लोकसभा में बिल लाई, लेकिन विरोध के कारण गिर गया।
- 1998-2003: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने कई बार कोशिश की, लेकिन संसद में बिल फाड़े गए और भारी हंगामा हुआ।
- 2010: मनमोहन सरकार ने राज्यसभा में बिल पास कराया, लेकिन लोकसभा में यह अटक गया।
- 2023: मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित कराकर इसे कानून बनाया।
भविष्य की राह
अगर यह संशोधन बिल पास हो जाता है, तो न केवल लोकसभा बल्कि देश की सभी विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या बढ़ेगी और महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होगी।
यह कदम भारत को वैश्विक मंच पर उन देशों की कतार में खड़ा कर देगा जहाँ विधायी निकायों में महिलाओं की मजबूत उपस्थिति है।
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