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मध्यप्रदेश में बदले नगरीय निकाय चुनाव के नियम: अब चुनाव लड़ना हुआ महंगा, खर्च की पाई-पाई का देना होगा हिसाब

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Civic Body Election Rules: मध्यप्रदेश में अगले साल होने वाले नगरीय निकाय (नगर निगम, नगरपालिका और नगर परिषद) चुनावों से पहले राज्य सरकार ने चुनाव प्रणाली में कई बड़े और अहम बदलाव कर दिए हैं।

अगर आप या आपका कोई परिचित आगामी निकाय चुनाव में महापौर (मेयर), नगरपालिका अध्यक्ष या फिर पार्षद का चुनाव लड़ने का सपना देख रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है।

राज्य के नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने ‘मध्यप्रदेश नगरपालिका निर्वाचन नियम, 1994’ में संशोधन करते हुए नई अधिसूचना जारी की है।

इस नए संशोधन के तहत अब प्रत्याशियों को पहले से ज्यादा जमानत राशि (सिक्योरिटी डिपॉजिट) जमा करनी होगी, चुनाव खर्च के लिए अलग से बैंक खाता खोलना होगा और पाई-पाई का हिसाब चुनाव आयोग के सामने पेश करना होगा।

आइए, जानते हैं कि सरकार ने चुनाव नियमों में क्या-क्या बड़े बदलाव किए हैं।

जमानत राशि में बड़ी बढ़ोतरी: अब जेब ढीली करनी होगी

अब तक निकाय चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए बहुत कम सिक्योरिटी डिपॉजिट देना पड़ता था, लेकिन नए नियमों के तहत इसे काफी बढ़ा दिया गया है।

* महापौर (Mayoral Candidate): महापौर पद का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अब 32,000 रुपये की जमानत राशि जमा करनी होगी।

 * नगरपालिका अध्यक्ष (Municipal Council President): नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के लिए अब 24,000 रुपये जमानत राशि के रूप में देने होंगे।

इस कदम का मुख्य मकसद चुनाव में गैर-गंभीर प्रत्याशियों की संख्या को नियंत्रित करना है ताकि केवल वही लोग मैदान में उतरें जो चुनाव को लेकर गंभीर हैं।

2. पर्चा भरने (नामांकन) के लिए मिलेंगे कम से कम 7 दिन

अक्सर देखा जाता था कि नामांकन दाखिल करने के लिए उम्मीदवारों को बहुत कम समय मिलता था, जिससे अफरा-तफरी मच जाती थी। अब नए नियम के अनुसार:

* नामांकन प्रक्रिया शुरू होने की आधिकारिक सूचना जारी होने के बाद प्रत्याशियों को फॉर्म भरने के लिए कम से कम 7 दिनों का समय अनिवार्य रूप से दिया जाएगा।

 * अगर नामांकन दाखिल करने का सातवां दिन किसी सरकारी छुट्टी (पब्लिक हॉलिडे) के दिन पड़ता है, तो प्रत्याशियों को राहत देते हुए उसके अगले कामकाजी दिन (वर्किंग डे) तक पर्चा जमा करने की छूट मिलेगी।

3. एक पद के लिए एक ही नामांकन-पत्र होगा मान्य

अक्सर प्रत्याशी किसी एक ही पद के लिए दो या तीन सेट में फॉर्म भर देते थे ताकि कोई गलती होने पर दूसरा फॉर्म काम आ जाए। लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।

संशोधित नियमों के तहत, एक ही पद के लिए कोई भी उम्मीदवार केवल एक ही नामांकन-पत्र जमा कर सकता है।

अगर कोई प्रत्याशी एक से ज्यादा नामांकन पत्र दाखिल करने की कोशिश करेगा, तो रिटर्निंग ऑफिसर (RO) उसे स्वीकार नहीं करेगा।

4. अलग बैंक अकाउंट खोलना जरूरी, चुनाव खर्च पर कड़ा पहरा

चुनाव में काले धन और बेहिसाब खर्च को रोकने के लिए सरकार ने बहुत सख्त कदम उठाया है।

* अलग से नया बैंक अकाउंट:

महापौर, नगरपालिका अध्यक्ष, नगर परिषद अध्यक्ष और पार्षद—इन सभी पदों के उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार शुरू करने से पहले किसी भी राष्ट्रीयकृत (Nationalized) बैंक में एक नया और स्वतंत्र बैंक खाता खोलना होगा।

* रिटर्निंग ऑफिसर को देनी होगी जानकारी:

पर्चा दाखिल करते समय उम्मीदवार को इस नए बैंक खाते की पूरी डिटेल चुनाव अधिकारी को सौंपनी होगी।

चुनाव में होने वाले हर छोटे-बड़े लेन-देन (आवक और खर्च) को इसी बैंक खाते के जरिए करना अनिवार्य होगा।

* नामांकन से लेकर काउंटिंग तक का हिसाब:

उम्मीदवार को नामांकन पत्र भरने के दिन से लेकर वोटों की गिनती (मतगणना) के दिन तक का पूरा खर्च दर्ज करना होगा।

अगर कोई प्रत्याशी अपने खर्च का ब्यौरा देने में नाकाम रहता है या गलत जानकारी देता है, तो चुनाव आयोग उसे भविष्य में चुनाव लड़ने से अयोग्य (Disqualify) घोषित कर सकता है।

5. ‘राइट टू रिकॉल’ और पद खाली होने की प्रक्रिया तय

संशोधित नियमों में सिर्फ चुनाव लड़ने की प्रक्रिया ही नहीं बदली है, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधियों को पद से हटाने और पद खाली होने की स्थिति को लेकर भी गाइडलाइंस साफ की गई हैं:

* राइट टू रिकॉल (पद से वापस बुलाना):

अगर जनता या जनप्रतिनिधि किसी महापौर या अध्यक्ष के काम से संतुष्ट नहीं हैं, तो उन्हें पद से हटाने (Right to Recall) की प्रक्रिया मध्यप्रदेश नगर निगम अधिनियम 1956 के नियमों के अनुसार राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पूरी की जाएगी।

* पद खाली होने पर तुरंत सूचना:

यदि किसी महापौर, अध्यक्ष या पार्षद की अचानक मृत्यु हो जाती है, वे इस्तीफा दे देते हैं या फिर उनका निर्वाचन रद्द कर दिया जाता है, तो इसकी सूचना तुरंत तय समय-सीमा के भीतर जिला निर्वाचन अधिकारी को देनी होगी ताकि आगे की प्रक्रिया शुरू की जा सके।

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा किए गए ये नए बदलाव निकाय चुनावों में पारदर्शिता लाने और चुनावी प्रक्रिया को अधिक अनुशासित बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए हैं।

अब देखना यह होगा कि इन कड़े नियमों का आने वाले चुनावों पर कितना प्रभाव पड़ता है।

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